श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.7.1

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

अथ सप्तमोऽध्यायः

भगवान्‌के लीलावतारोंकी कथा

ब्रह्मोवाच

यत्रोद्यतः क्षितितलोद्धरणाय बिभ्रत्

क्रौडीं तनुं सकलयज्ञमयीमनन्तः।

अन्तर्महार्णव उपागतमादिदैत्यं

तं दंष्ट्रयाद्रिमिव वज्रधरो ददार॥ १

yatrodyataḥ kṣititaloddharaṇāya bibhrat

krauḍīṃ tanuṃ sakalayajñamayīmanantaḥ|

antarmahārṇava upāgatamādidaityaṃ

taṃ daṃṣṭrayādrimiva vajradharo dadāra|| 1

अर्थ

ब्रह्माजी कहते हैं—अनन्तभगवान्‌ने प्रलयके जलमें डूबी हुई पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये समस्त यज्ञमय वराहशरीर ग्रहण किया था। आदिदैत्य हिरण्याक्ष जलके अंदर ही लड़नेके लिये उनके सामने आया। जैसे इन्द्रने अपने वज्रसे पर्वतोंके पंख काट डाले थे, वैसे ही वराहभगवान्‌ने अपनी दाढ़ोंसे उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये॥ १॥ ✎ 143 144

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #143 शब्दोंके बीचका स्थान: वराहभगवान् ने → वराहभगवान्‌ने
  • #144 शब्दोंके बीचका स्थान: अनन्तभगवान् ने → अनन्तभगवान्‌ने

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