॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.7.39
सर्गे तपोऽहमृषयो नव ये प्रजेशाः
स्थाने च धर्ममखमन्वमरावनीशाः।
अन्ते त्वधर्महरमन्युवशासुराद्या
मायाविभूतय इमाः पुरुशक्तिभाजः॥ ३९
sarge tapo'hamṛṣayo nava ye prajeśāḥ
sthāne ca dharmamakhamanvamarāvanīśāḥ|
ante tvadharmaharamanyuvaśāsurādyā
māyāvibhūtaya imāḥ puruśaktibhājaḥ|| 39
अर्थ
जब संसारकी रचनाका समय होता है, तब तपस्या, नौ प्रजापति, मरीचि आदि ऋषि और मेरे रूपमें; जब सृष्टिकी रक्षाका समय होता है, तब धर्म, विष्णु, मनु, देवता और राजाओंके रूपमें तथा जब सृष्टिके प्रलयका समय होता है, तब अधर्म, रुद्र तथा क्रोधवश नामके सर्प एवं दैत्य आदिके रूपमें सर्वशक्तिमान् भगवान्की माया-विभूतियाँ ही प्रकट होती हैं ॥ ३९॥✎ 158 159 160