श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.7.40

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

विष्णोर्नु वीर्यगणनां कतमोऽर्हतीह

यः पार्थिवान्यपि कविर्विममे रजांसि।

चस्कम्भ यः स्वरंहसास्खलता त्रिपृष्ठं

यस्मात् त्रिसाम्यसदनादुरु कम्पयानम्॥ ४०

viṣṇornu vīryagaṇanāṃ katamo'rhatīha

yaḥ pārthivānyapi kavirvimame rajāṃsi|

caskambha yaḥ svaraṃhasāskhalatā tripṛṣṭhaṃ

yasmāt trisāmyasadanāduru kampayānam|| 40

अर्थ

अपनी प्रतिभाके बलसे पृथ्वीके एक-एक धूलिकणको गिन चुकनेपर भी जगत‍्में ऐसा कौन पुरुष है, जो भगवान्‌की शक्तियोंकी गणना कर सके। जब वे त्रिविक्रम-अवतार लेकर त्रिलोकीको नाप रहे थे, उस समय उनके चरणोंके अदम्य वेगसे प्रकृतिरूप अन्तिम आवरणसे लेकर सत्यलोकतक सारा ब्रह्माण्ड काँपने लगा था। तब उन्होंने ही अपनी शक्तिसे उसे स्थिर किया था ॥ ४०॥✎ 158 159 160

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #158 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #159 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #160 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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