श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.7.4

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

अत्रेरपत्यमभिकाङ्क्षत आह तुष्टो

दत्तो मयाहमिति यद् भगवान् स दत्तः।

यत्पादपङ्कजपरागपवित्रदेहा

योगर्द्धिमापुरुभयीं यदुहैहयाद्याः॥ ४

atrerapatyamabhikāṅkṣata āha tuṣṭo

datto mayāhamiti yad bhagavān sa dattaḥ|

yatpādapaṅkajaparāgapavitradehā

yogarddhimāpurubhayīṃ yaduhaihayādyāḥ|| 4

अर्थ

महर्षि अत्रि भगवान्‌को पुत्ररूपमें प्राप्त करना चाहते थे। उनपर प्रसन्‍न होकर भगवान्‌ने उनसे एक दिन कहा कि ‘मैंने अपने-आपको तुम्हें दे दिया।’ इसीसे अवतार लेनेपर भगवान्‌का नाम ‘दत्त’ (दत्तात्रेय) पड़ा। उनके चरणकमलोंके परागसे अपने शरीरको पवित्र करके राजा यदु और सहस्रार्जुन आदिने योगकी, भोग और मोक्ष दोनों ही सिद्धियाँ प्राप्त कीं॥ ४॥✎ 146 147

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #146 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #147 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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