श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.7.5

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

तप्तं तपो विविधलोकसिसृक्षया मे

आदौ सनात् स्वतपसः स चतुःसनोऽभूत्।

प्राक्कल्पसम्प्लवविनष्टमिहात्मतत्त्वं

सम्यग् जगाद मुनयो यदचक्षतात्मन्॥ ५

taptaṃ tapo vividhalokasisṛkṣayā me

ādau sanāt svatapasaḥ sa catuḥsano'bhūt|

prākkalpasamplavavinaṣṭamihātmatattvaṃ

samyag jagāda munayo yadacakṣatātman|| 5

अर्थ

नारद! सृष्टिके प्रारम्भमें मैंने विविध लोकोंको रचनेकी इच्छासे तपस्या की। मेरे उस अखण्ड तपसे प्रसन्‍न होकर उन्होंने ‘तप’ अर्थवाले ‘सन’ नामसे युक्त होकर सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमारके रूपमें अवतार ग्रहण किया। इस अवतारमें उन्होंने प्रलयके कारण पहले कल्पके भूले हुए आत्मज्ञानका ऋषियोंके प्रति यथावत् उपदेश किया, जिससे उन लोगोंने तत्काल परम तत्त्वका अपने हृदयमें साक्षात्कार कर लिया॥ ५॥

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