॥ श्रीहरिः ॥
प्रमाणमण्डकोशस्य बाह्याभ्य१न्तरभेदतः।
महतां चा२नुचरितं वर्णाश्रमविनिश्चयः॥ १६
pramāṇamaṇḍakośasya bāhyābhyantarabhedataḥ|
mahatāṃ cānucaritaṃ varṇāśramaviniścayaḥ|| 16
अर्थ
ब्रह्माण्डका परिमाण भीतर और बाहर—दोनों प्रकारसे बतलाइये। साथ ही महापुरुषोंके चरित्र, वर्णाश्रमके भेद और उनके धर्मका निरूपण कीजिये॥ १६॥✎ 167 168
प्रमाणमण्डकोशस्य बाह्याभ्यन्तरभेदतः।
महतां चानुचरितं वर्णाश्रमविनिश्चयः॥ १६
ब्रह्माण्डका परिमाण भीतर और बाहर—दोनों प्रकारसे बतलाइये। साथ ही महापुरुषोंके चरित्र, वर्णाश्रमके भेद और उनके धर्मका निरूपण कीजिये॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.8.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 220) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/8/16/टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—भ्यन्तरवस्तुनः।
(मुद्रित पृष्ठ 220) - २
प्रा० पा०—चारु चरितं।
(मुद्रित पृष्ठ 220)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
- #167 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की
- #168 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्की