ब्रह्मन्! आप मेरी भूख-प्यासकी चिन्ता न करें। मेरे प्राण कुपित ब्राह्मणके शापके अतिरिक्त और किसी कारणसे निकल नहीं सकते; क्योंकि मैं आपके मुखारविन्दसे निकलनेवाली भगवान्की अमृतमयी लीलाकथाका पान कर रहा हूँ॥ २६॥✎ 167168
न मेऽसवः परायन्ति ब्रह्मन्ननशनादमी।
पिबतोऽच्युतपीयूषमन्यत्र कुपिताद् द्विजात्॥ २६
ब्रह्मन्! आप मेरी भूख-प्यासकी चिन्ता न करें। मेरे प्राण कुपित ब्राह्मणके शापके अतिरिक्त और किसी कारणसे निकल नहीं सकते; क्योंकि मैं आपके मुखारविन्दसे निकलनेवाली भगवान्की अमृतमयी लीलाकथाका पान कर रहा हूँ॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.8.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 221) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/2/8/26/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)