श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.8.26

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

न मेऽसवः परायन्ति ब्रह्मन्‍ननशनादमी।

पिबतोऽच्युतपीयूषमन्यत्र कुपिताद् द्विजात्॥ २६

na me'savaḥ parāyanti brahmannanaśanādamī|

pibato'cyutapīyūṣamanyatra kupitād dvijāt|| 26

अर्थ

ब्रह्मन्! आप मेरी भूख-प्यासकी चिन्ता न करें। मेरे प्राण कुपित ब्राह्मणके शापके अतिरिक्त और किसी कारणसे निकल नहीं सकते; क्योंकि मैं आपके मुखारविन्दसे निकलनेवाली भगवान्‌की अमृतमयी लीलाकथाका पान कर रहा हूँ॥ २६॥✎ 167 168

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #167 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #168 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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