श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.9.19

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

त्वयाहं तोषितः सम्यग् वेदगर्भ सिसृक्षया।

चिरं भृतेन तपसा दुस्तोषः कूटयोगिनाम्॥ १९

tvayāhaṃ toṣitaḥ samyag vedagarbha sisṛkṣayā|

ciraṃ bhṛtena tapasā dustoṣaḥ kūṭayoginām|| 19

अर्थ

श्रीभगवान्‌ने कहा—ब्रह्माजी! तुम्हारे हृदयमें तो समस्त वेदोंका ज्ञान विद्यमान है। तुमने सृष्टिरचनाकी इच्छासे चिरकालतक तपस्या करके मुझे भलीभाँति सन्तुष्ट कर दिया है। मनमें कपट रखकर योगसाधन करनेवाले मुझे कभी प्रसन्‍न नहीं कर सकते॥ १९॥ तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारी जो अभिलाषा हो, वही वर मुझसे माँग लो। क्योंकि मैं मुँहमाँगी वस्तु देनेमें समर्थ हूँ। ब्रह्माजी! जीवके समस्त कल्याणकारी साधनोंका विश्राम—पर्यवसान मेरे दर्शनमें ही है॥ २०॥ तुमने मुझे देखे बिना ही उस सूने जलमें मेरी वाणी सुनकर इतनी घोर तपस्या की है, इसीसे मेरी इच्छासे तुम्हें मेरे लोकका दर्शन हुआ है॥ २१॥ ✎ 174

यह व्याख्या श्लोक 2.9.19 से 2.9.21 तककी एक साथ है।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #174 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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