तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारी जो अभिलाषा हो, वही वर मुझसे माँग लो। क्योंकि मैं मुँहमाँगी वस्तु देनेमें समर्थ हूँ। ब्रह्माजी! जीवके समस्त कल्याणकारी साधनोंका विश्राम—पर्यवसान मेरे दर्शनमें ही है॥ २०॥✎ 174
वरं वरय भद्रं ते वरेशं माभिवाञ्छितम्।
ब्रह्मञ्छ्रेयः परिश्रामः पुंसो मद्दर्शनावधिः॥ २०
तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारी जो अभिलाषा हो, वही वर मुझसे माँग लो। क्योंकि मैं मुँहमाँगी वस्तु देनेमें समर्थ हूँ। ब्रह्माजी! जीवके समस्त कल्याणकारी साधनोंका विश्राम—पर्यवसान मेरे दर्शनमें ही है॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.9.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 224) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/2/9/20/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#174 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने