तुमने मुझे देखे बिना ही उस सूने जलमें मेरी वाणी सुनकर इतनी घोर तपस्या की है, इसीसे मेरी इच्छासे तुम्हें मेरे लोकका दर्शन हुआ है॥ २१॥✎ 174
मनीषितानुभावोऽयं मम लोकावलोकनम्।
यदुपश्रुत्य रहसि चकर्थ परमं तपः॥ २१
तुमने मुझे देखे बिना ही उस सूने जलमें मेरी वाणी सुनकर इतनी घोर तपस्या की है, इसीसे मेरी इच्छासे तुम्हें मेरे लोकका दर्शन हुआ है॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.9.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 224) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/2/9/21/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#174 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने