श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.9.22

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

प्रत्यादिष्टं मया तत्र त्वयि कर्मविमोहिते।

तपो मे हृदयं साक्षादात्माहं तपसोऽनघ॥ २२

pratyādiṣṭaṃ mayā tatra tvayi karmavimohite|

tapo me hṛdayaṃ sākṣādātmāhaṃ tapaso'nagha|| 22

अर्थ

तुम उस समय सृष्टिरचनाका कर्म करनेमें किंकर्तव्यविमूढ़ हो रहे थे। इसीसे मैंने तुम्हें तपस्या करनेकी आज्ञा दी थी। क्योंकि निष्पाप! तपस्या मेरा हृदय है और मैं स्वयं तपस्याका आत्मा हूँ॥ २२॥

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