ब्रह्माजीकी निष्कपट तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान्ने उन्हें अपने रूपका दर्शन कराया और आत्म-तत्त्वके ज्ञानके लिये उन्हें परम सत्य परमार्थ वस्तुका उपदेश किया (वही बात मैं तुम्हें सुनाता हूँ)॥ ४॥✎ 171
आत्मतत्त्वविशुद्ध्यर्थं यदाह भगवानृतम्।
ब्रह्मणे दर्शयन् रूपमव्यलीकव्रतादृतः॥ ४
ब्रह्माजीकी निष्कपट तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान्ने उन्हें अपने रूपका दर्शन कराया और आत्म-तत्त्वके ज्ञानके लिये उन्हें परम सत्य परमार्थ वस्तुका उपदेश किया (वही बात मैं तुम्हें सुनाता हूँ)॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.9.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 222) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/2/9/4/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)