॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.9.5
स आदिदेवो जगतां परो गुरुः
स्वधिष्ण्यमास्थाय सिसृक्षयैक्षत।
तां नाध्यगच्छद् दृशमत्र सम्मतां
प्रपञ्चनिर्माणविधिर्यया भवेत्॥ ५
sa ādidevo jagatāṃ paro guruḥ
svadhiṣṇyamāsthāya sisṛkṣayaikṣata|
tāṃ nādhyagacchad dṛśamatra sammatāṃ
prapañcanirmāṇavidhiryayā bhavet|| 5
अर्थ
तीनों लोकोंके परम गुरु आदिदेव ब्रह्माजी अपने जन्मस्थान कमलपर बैठकर सृष्टि करनेकी इच्छासे विचार करने लगे। परन्तु जिस ज्ञानदृष्टिसे सृष्टिका निर्माण हो सकता था और जो सृष्टि-व्यापारके लिये वांछनीय है, वह दृष्टि उन्हें प्राप्त नहीं हुई॥ ५॥ एक दिन वे यही चिन्ता कर रहे थे कि प्रलयके समुद्रमें उन्होंने व्यंजनोंके सोलहवें एवं इक्कीसवें अक्षर ‘त’ तथा ‘प’ को—‘तप-तप’ (‘तप करो’) इस प्रकार दो बार सुना। परीक्षित्! महात्मालोग इस तपको ही त्यागियोंका धन मानते हैं॥ ६॥ यह सुनकर ब्रह्माजीने वक्ताको देखनेकी इच्छासे चारों ओर देखा, परन्तु वहाँ दूसरा कोई दिखायी न पड़ा। वे अपने कमलपर बैठ गये और ‘मुझे तप करनेकी प्रत्यक्ष आज्ञा मिली है’ ऐसा निश्चयकर और उसीमें अपना हित समझकर उन्होंने अपने मनको तपस्यामें लगा दिया॥ ७॥ ब्रह्माजी तपस्वियोंमें सबसे बड़े तपस्वी हैं। उनका ज्ञान अमोघ है। उन्होंने उस समय एक सहस्र दिव्य वर्षपर्यन्त एकाग्र चित्तसे अपने प्राण, मन, कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रियोंको वशमें करके ऐसी तपस्या की, जिससे वे समस्त लोकोंको प्रकाशित करनेमें समर्थ हो सके॥ ८॥