श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.9.6

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

स चिन्तयन् द‍्व्यक्षरमेकदाम्भ-

स्युपाशृणोद् द्विर्गदितं वचो विभुः।

स्पर्शेषु यत्षोडशमेकविंशं

निष्किञ्चनानां नृप यद् धनं विदुः॥ ६

sa cintayan dvyakṣaramekadāmbha-

syupāśṛṇod dvirgaditaṃ vaco vibhuḥ|

sparśeṣu yatṣoḍaśamekaviṃśaṃ

niṣkiñcanānāṃ nṛpa yad dhanaṃ viduḥ|| 6

अर्थ

एक दिन वे यही चिन्ता कर रहे थे कि प्रलयके समुद्रमें उन्होंने व्यंजनोंके सोलहवें एवं इक्कीसवें अक्षर ‘त’ तथा ‘प’ को—‘तप-तप’ (‘तप करो’) इस प्रकार दो बार सुना। परीक्षित्! महात्मालोग इस तपको ही त्यागियोंका धन मानते हैं॥ ६॥

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