उस समय उनके पुत्रोंमें सबसे अधिक प्रिय, परम भक्त देवर्षि नारदजीने मायापति भगवान्की मायाका तत्त्व जाननेकी इच्छासे बड़े संयम, विनय और सौम्यतासे अनुगत होकर उनकी सेवा की और उन्होंने सेवासे ब्रह्माजीको बहुत ही सन्तुष्ट कर लिया॥ ४०-४१॥✎ 176177178179
यह अर्थ श्लोक 40–41 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
मायां विविदिषन् विष्णोर्मायेशस्य महामुनिः।
महाभागवतो राजन् पितरं पर्यतोषयत्॥ ४१
उस समय उनके पुत्रोंमें सबसे अधिक प्रिय, परम भक्त देवर्षि नारदजीने मायापति भगवान्की मायाका तत्त्व जाननेकी इच्छासे बड़े संयम, विनय और सौम्यतासे अनुगत होकर उनकी सेवा की और उन्होंने सेवासे ब्रह्माजीको बहुत ही सन्तुष्ट कर लिया॥ ४०-४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.9.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 227) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/2/9/41/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)