श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.9.42

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

तुष्टं निशाम्य पितरं लोकानां प्रपितामहम्।

देवर्षिः परिपप्रच्छ भवान् य१न्मानुपृच्छति॥ ४२

tuṣṭaṃ niśāmya pitaraṃ lokānāṃ prapitāmaham|

devarṣiḥ paripapraccha bhavān yanmānupṛcchati|| 42

अर्थ

परीक्षित्! जब देवर्षि नारदने देखा कि मेरे लोकपितामह पिताजी मुझपर प्रसन्‍न हैं, तब उन्होंने उनसे यही प्रश्न किया, जो तुम मुझसे कर रहे हो॥ ४२॥✎ 176 177 178 179

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—भवान् यदनु।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 227)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #176 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #177 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #178 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #179 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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