श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.1.28

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

कच्चिद्वरूथाधिपतिर्यदूनां

प्रद्युम्न आस्ते सुखमङ्ग वीरः।

यं रुक्मिणी भगवतोऽभिलेभे

आराध्य विप्रान् स्मरमादिसर्गे॥ २८

kaccidvarūthādhipatiryadūnāṃ

pradyumna āste sukhamaṅga vīraḥ|

yaṃ rukmiṇī bhagavato'bhilebhe

ārādhya viprān smaramādisarge|| 28

अर्थ

प्यारे उद्धवजी! यादवोंके सेनापति वीरवर प्रद्युम्नजी तो प्रसन्‍न हैं न, जो पूर्वजन्ममें कामदेव थे तथा जिन्हें देवी रुक्मिणीजीने ब्राह्मणोंकी आराधना करके भगवान्‌से प्राप्त किया था॥ २८॥✎ 186 1294

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #186 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1294 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): राजसिंहा-सनपर → राजसिंहासनपर

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें