श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.10.15

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

द्वितीयस्त्वहमो यत्र द्रव्यज्ञानक्रियोदयः।

भूतसर्गस्तृतीयस्तु तन्मात्रो द्रव्यशक्तिमान्॥ १५

dvitīyastvahamo yatra dravyajñānakriyodayaḥ|

bhūtasargastṛtīyastu tanmātro dravyaśaktimān|| 15

अर्थ

दूसरी सृष्टि अहंकारकी है, जिससे पृथ्वी आदि पंचभूत एवं ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रियोंकी उत्पत्ति होती है। तीसरी सृष्टि भूतसर्ग है, जिसमें पंचमहाभूतोंको उत्पन्‍न करनेवाला तन्मात्रवर्ग रहता है॥ १५॥✎ 242 243 244 245

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #242 शब्दोंके बीचका स्थान: सृष्टियोंकाभी → सृष्टियोंका भी
  • #243 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #244 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #245 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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