श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.10.17

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

षष्ठस्तु तमसः सर्गो यस्त्वबुद्धिकृतः प्रभो।

षडिमे प्राकृताः सर्गा वैकृतानपि मे शृणु॥ १७

ṣaṣṭhastu tamasaḥ sargo yastvabuddhikṛtaḥ prabho|

ṣaḍime prākṛtāḥ sargā vaikṛtānapi me śṛṇu|| 17

अर्थ

छठी सृष्टि अविद्याकी है। इसमें तामिस्र, अन्धतामिस्र, तम, मोह और महामोह—ये पाँच गाँठें हैं। यह जीवोंकी बुद्धिका आवरण और विक्षेप करनेवाली है। ये छः प्राकृत सृष्टियाँ हैं, अब वैकृत सृष्टियोंका भी विवरण सुनो॥ १७॥✎ 242 243 244 245

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #242 शब्दोंके बीचका स्थान: सृष्टियोंकाभी → सृष्टियोंका भी
  • #243 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #244 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #245 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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