श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.11.25

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

एष दैनन्दिनः सर्गो ब्राह्मस्त्रैलोक्यवर्तनः।

तिर्यङ्नृपितृदेवानां सम्भवो यत्र कर्मभिः॥ २५

eṣa dainandinaḥ sargo brāhmastrailokyavartanaḥ|

tiryaṅnṛpitṛdevānāṃ sambhavo yatra karmabhiḥ|| 25

अर्थ

यह ब्रह्माजीकी प्रतिदिनकी सृष्टि है, जिसमें तीनों लोकोंकी रचना होती है। उसमें अपने-अपने कर्मानुसार पशु-पक्षी, मनुष्य, पितर और देवताओंकी उत्पत्ति होती है॥ २५॥✎ 246 247

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #246 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #247 शब्दोंके बीचका स्थान: २४॥यह → २४॥ यह

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