तब उस जलके भीतर भगवान् शेषशायी योगनिद्रासे नेत्र मूँदकर शयन करते हैं। उस समय जनलोकनिवासी मुनिगण उनकी स्तुति किया करते हैं॥ ३१॥✎ 246247
अन्तः स तस्मिन् सलिल आस्तेऽनन्तासनो हरिः।
योगनिद्रानिमीलाक्षः स्तूयमानो जनालयैः॥ ३१
तब उस जलके भीतर भगवान् शेषशायी योगनिद्रासे नेत्र मूँदकर शयन करते हैं। उस समय जनलोकनिवासी मुनिगण उनकी स्तुति किया करते हैं॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.11.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 285) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/11/31/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)