यह परमाणुसे लेकर द्विपरार्धपर्यन्त फैला हुआ काल सर्वसमर्थ होनेपर भी सर्वात्मा श्रीहरिपर किसी प्रकारकी प्रभुता नहीं रखता। यह तो देहादिमें अभिमान रखनेवाले जीवोंका ही शासन करनेमें समर्थ है॥ ३८॥✎ 248
कालोऽयं परमाण्वादिर्द्विपरार्धान्त ईश्वरः।
नैवेशितुं प्रभुर्भूम्न ईश्वरो धाममानिनाम्॥ ३८
यह परमाणुसे लेकर द्विपरार्धपर्यन्त फैला हुआ काल सर्वसमर्थ होनेपर भी सर्वात्मा श्रीहरिपर किसी प्रकारकी प्रभुता नहीं रखता। यह तो देहादिमें अभिमान रखनेवाले जीवोंका ही शासन करनेमें समर्थ है॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.11.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 286) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/11/38/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)