श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.13.1

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

अथ त्रयोदशोऽध्यायः

वाराह-अवतारकी कथा

श्रीशुक उवाच

निशम्य वाचं वदतो मुनेः पुण्यतमां नृप।

भूयः पप्रच्छ कौरव्यो वासुदेवकथादृतः॥ १

niśamya vācaṃ vadato muneḥ puṇyatamāṃ nṛpa|

bhūyaḥ papraccha kauravyo vāsudevakathādṛtaḥ|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजीने कहा—राजन्! मुनिवर मैत्रेयजीके मुखसे यह परम पुण्यमयी कथा सुनकर श्रीविदुरजीने फिर पूछा; क्योंकि भगवान्‌की लीला-कथामें इनका अत्यन्त अनुराग हो गया था॥ १॥✎ 252

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #252 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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