श्रीशुकदेवजीने कहा—राजन्! मुनिवर मैत्रेयजीके मुखसे यह परम पुण्यमयी कथा सुनकर श्रीविदुरजीने फिर पूछा; क्योंकि भगवान्की लीला-कथामें इनका अत्यन्त अनुराग हो गया था॥ १॥✎ 252
निशम्य वाचं वदतो मुनेः पुण्यतमां नृप।
भूयः पप्रच्छ कौरव्यो वासुदेवकथादृतः॥ १
श्रीशुकदेवजीने कहा—राजन्! मुनिवर मैत्रेयजीके मुखसे यह परम पुण्यमयी कथा सुनकर श्रीविदुरजीने फिर पूछा; क्योंकि भगवान्की लीला-कथामें इनका अत्यन्त अनुराग हो गया था॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.13.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 292) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/13/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)