॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.13.33
तमालनीलं सितदन्तकोट्या
क्ष्मामुत्क्षिपन्तं गजलीलयाङ्ग।
प्रज्ञाय बद्धाञ्जलयोऽनुवाकै-
र्विरिञ्चिमुख्या उपतस्थुरीशम्॥ ३३
tamālanīlaṃ sitadantakoṭyā
kṣmāmutkṣipantaṃ gajalīlayāṅga|
prajñāya baddhāñjalayo'nuvākai-
rviriñcimukhyā upatasthurīśam|| 33
अर्थ
तात! जैसे गजराज अपने दाँतोंपर कमल-पुष्प धारण कर ले, उसी प्रकार अपने सफेद दाँतोंकी नोकपर पृथ्वीको धारण कर जलसे बाहर निकले हुए, तमालके समान नीलवर्ण वराहभगवान्को देखकर ब्रह्मा, मरीचि आदिको निश्चय हो गया कि ये भगवान् ही हैं। तब वे हाथ जोड़कर वेदवाक्योंसे उनकी स्तुति करने लगे॥ ३३॥✎ 255