श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.13.48

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

य एवमेतां हरिमेधसो हरेः

कथां सुभद्रां कथनीयमायिनः।

शृण्वीत भक्‍त्या श्रवयेत वोशतीं

जनार्दनोऽस्याशु हृदि प्रसीदति॥ ४८

ya evametāṃ harimedhaso hareḥ

kathāṃ subhadrāṃ kathanīyamāyinaḥ|

śṛṇvīta bhaktyā śravayeta vośatīṃ

janārdano'syāśu hṛdi prasīdati|| 48

अर्थ

विदुरजी! भगवान्‌के लीलामय चरित्र अत्यन्त कीर्तनीय हैं और उनमें लगी हुई बुद्धि सब प्रकारके पाप-तापोंको दूर कर देती है। जो पुरुष उनकी इस मंगलमयी मंजुल कथाको भक्तिभावसे सुनता या सुनाता है, उसके प्रति भक्तवत्सल भगवान् अन्तस्तलसे बहुत शीघ्र प्रसन्‍न हो जाते हैं॥ ४८॥✎ 257

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #257 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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