श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.13.5

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इति ब्रुवाणं विदुरं विनीतं

सहस्रशीर्ष्णश्‍चरणोपधानम् ।

प्रहृष्टरोमा भगवत्कथायां

प्रणीयमानो मुनिरभ्यचष्ट॥ ५

iti bruvāṇaṃ viduraṃ vinītaṃ

sahasraśīrṣṇaścaraṇopadhānam |

prahṛṣṭaromā bhagavatkathāyāṃ

praṇīyamāno munirabhyacaṣṭa|| 5

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! विदुरजी सहस्रशीर्षा भगवान् श्रीहरिके चरणाश्रित भक्त थे। उन्होंने जब विनयपूर्वक भगवान्‌की कथाके लिये प्रेरणा की, तब मुनिवर मैत्रेयका रोम-रोम खिल उठा। उन्होंने कहा॥ ५॥✎ 253

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #253 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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