श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.14.27

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

हसन्ति यस्याचरितं हि दुर्भगाः

स्वात्मन् रतस्याविदुषः समीहितम्।

यैर्वस्त्रमाल्याभरणानुलेपनैः

श्‍वभोजनं स्वात्मतयोपलालितम्॥ २७

hasanti yasyācaritaṃ hi durbhagāḥ

svātman ratasyāviduṣaḥ samīhitam|

yairvastramālyābharaṇānulepanaiḥ

śvabhojanaṃ svātmatayopalālitam|| 27

अर्थ

यह नरशरीर कुत्तोंका भोजन है; जो अविवेकी पुरुष आत्मा मानकर वस्त्र, आभूषण, माला और चन्दनादिसे इसीको सजाते-सँवारते रहते हैं—वे अभागे ही आत्माराम भगवान् शंकरके आचरणपर हँसते हैं॥ २७॥

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