मैत्रेयजी कहते हैं—पतिके इस प्रकार समझानेपर भी कामातुरा दितिने वेश्याके समान निर्लज्ज होकर ब्रह्मर्षि कश्यपजीका वस्त्र पकड़ लिया॥ २९॥ तब कश्यपजीने उस निन्दित कर्ममें अपनी भार्याका बहुत आग्रह देख दैवको नमस्कार किया और एकान्तमें उसके साथ समागम किया॥ ३०॥ फिर जलमें स्नानकर प्राण और वाणीका संयम करके विशुद्ध ज्योतिर्मय सनातन ब्रह्मका ध्यान करते हुए उसीका जप करने लगे॥ ३१॥
यह व्याख्या श्लोक 3.14.29 से 3.14.31 तककी एक साथ है।
सैवं संविदिते भर्त्रा मन्मथोन्मथितेन्द्रिया।
जग्राह वासो ब्रह्मर्षेर्वृषलीव गतत्रपा॥ २९
मैत्रेयजी कहते हैं—पतिके इस प्रकार समझानेपर भी कामातुरा दितिने वेश्याके समान निर्लज्ज होकर ब्रह्मर्षि कश्यपजीका वस्त्र पकड़ लिया॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.14.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 301) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/14/29/