फिर जलमें स्नानकर प्राण और वाणीका संयम करके विशुद्ध ज्योतिर्मय सनातन ब्रह्मका ध्यान करते हुए उसीका जप करने लगे॥ ३१॥
अथोपस्पृश्य सलिलं प्राणानायम्य वाग्यतः।
ध्यायञ्जजाप विरजं ब्रह्म ज्योतिः सनातनम्॥ ३१
फिर जलमें स्नानकर प्राण और वाणीका संयम करके विशुद्ध ज्योतिर्मय सनातन ब्रह्मका ध्यान करते हुए उसीका जप करने लगे॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.14.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 301) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/14/31/