श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.14.31

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

अथोपस्पृश्य सलिलं प्राणानायम्य वाग्यतः।

ध्यायञ्जजाप विरजं ब्रह्म ज्योतिः सनातनम्॥ ३१

athopaspṛśya salilaṃ prāṇānāyamya vāgyataḥ|

dhyāyañjajāpa virajaṃ brahma jyotiḥ sanātanam|| 31

अर्थ

फिर जलमें स्नानकर प्राण और वाणीका संयम करके विशुद्ध ज्योतिर्मय सनातन ब्रह्मका ध्यान करते हुए उसीका जप करने लगे॥ ३१॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें