दितिने कहा—प्रभो! यही मैं भी चाहती हूँ कि यदि मेरे पुत्रोंका वध हो तो वह साक्षात् भगवान् चक्रपाणिके हाथसे ही हो, कुपित ब्राह्मणोंके शापादिसे न हो॥ ४१॥
वधं भगवता साक्षात्सुनाभोदारबाहुना।
आशासे पुत्रयोर्मह्यं मा क्रुद्धाद्ब्राह्मणाद्विभो॥ ४१
दितिने कहा—प्रभो! यही मैं भी चाहती हूँ कि यदि मेरे पुत्रोंका वध हो तो वह साक्षात् भगवान् चक्रपाणिके हाथसे ही हो, कुपित ब्राह्मणोंके शापादिसे न हो॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.14.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 302) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/14/41/