जिस प्रकार खोटे सोनेको बार-बार तपाकर शुद्ध किया जाता है, उसी प्रकार साधुजन उसके स्वभावका अनुकरण करनेके लिये निर्वैरता आदि उपायोंसे अपने अन्तःकरणको शुद्ध करेंगे॥ ४५॥✎ 260
योगैर्हेमेव दुर्वर्णं भावयिष्यन्ति साधवः।
निर्वैरादिभिरात्मानं यच्छीलमनुवर्तितुम्॥ ४५
जिस प्रकार खोटे सोनेको बार-बार तपाकर शुद्ध किया जाता है, उसी प्रकार साधुजन उसके स्वभावका अनुकरण करनेके लिये निर्वैरता आदि उपायोंसे अपने अन्तःकरणको शुद्ध करेंगे॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.14.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 303) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/14/45/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#260 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्को