श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.14.47

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

स वै महाभागवतो महात्मा

महानुभावो महतां महिष्ठः।

प्रवृद्धभक्‍त्या ह्यनुभाविताशये

निवेश्य वैकुण्ठमिमं विहास्यति॥ ४७

sa vai mahābhāgavato mahātmā

mahānubhāvo mahatāṃ mahiṣṭhaḥ|

pravṛddhabhaktyā hyanubhāvitāśaye

niveśya vaikuṇṭhamimaṃ vihāsyati|| 47

अर्थ

दिति! वह बालक बड़ा ही भगवद्भक्त, उदारहृदय, प्रभावशाली और महान् पुरुषोंका भी पूज्य होगा तथा प्रौढ़ भक्तिभावसे विशुद्ध और भावान्वित हुए अन्तःकरणमें श्रीभगवान्‌को स्थापित करके देहाभिमानको त्याग देगा॥ ४७॥✎ 260

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #260 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् को → श्रीभगवान्‌को

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