॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.15.16
यत्र नैःश्रेयसं नाम वनं कामदुघैर्द्रुमैः।
सर्वर्तुश्रीभिर्विभ्राजत्कैवल्यमिव मूर्तिमत्॥ १६
yatra naiḥśreyasaṃ nāma vanaṃ kāmadughairdrumaiḥ|
sarvartuśrībhirvibhrājatkaivalyamiva mūrtimat|| 16
अर्थ
उस लोकमें नैःश्रेयस नामका एक वन है, जो मूर्तिमान् कैवल्य-सा ही जान पड़ता है। वह सब प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले वृक्षोंसे सुशोभित है, जो स्वयं हर समय छहों ऋतुओंकी शोभासे सम्पन्न रहते हैं॥ १६॥