श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.16

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

यत्र नैःश्रेयसं नाम वनं कामदुघैर्द्रुमैः।

सर्वर्तुश्रीभिर्विभ्राजत्कैवल्यमिव मूर्तिमत्॥ १६

yatra naiḥśreyasaṃ nāma vanaṃ kāmadughairdrumaiḥ|

sarvartuśrībhirvibhrājatkaivalyamiva mūrtimat|| 16

अर्थ

उस लोकमें नैःश्रेयस नामका एक वन है, जो मूर्तिमान् कैवल्य-सा ही जान पड़ता है। वह सब प्रकारकी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले वृक्षोंसे सुशोभित है, जो स्वयं हर समय छहों ऋतुओंकी शोभासे सम्पन्‍न रहते हैं॥ १६॥

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