श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.19

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

मन्दारकुन्दकुरबोत्पलचम्पकार्ण-

पुन्‍नागनागबकुलाम्बुजपारिजाताः ।

गन्धेऽर्चिते१ तुलसिकाभरणेन तस्या

यस्मिंस्तपः सुमनसो बहु मानयन्ति॥ १९

mandārakundakurabotpalacampakārṇa-

punnāganāgabakulāmbujapārijātāḥ |

gandhe'rcite tulasikābharaṇena tasyā

yasmiṃstapaḥ sumanaso bahu mānayanti|| 19

अर्थ

श्रीहरि तुलसीसे अपने श्रीविग्रहको सजाते हैं और तुलसीकी गन्धका ही अधिक आदर करते हैं—यह देखकर वहाँके मन्दार, कुन्द, कुरबक (तिलकवृक्ष), उत्पल (रात्रिमें खिलनेवाले कमल), चम्पक, अर्ण, पुन्‍नाग, नागकेसर, बकुल (मौलसिरी), अम्बुज (दिनमें खिलनेवाले कमल) और पारिजात आदि पुष्प सुगन्धयुक्त होनेपर भी तुलसीका ही तप अधिक मानते हैं॥ १९॥✎ 1591

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—गन्धेऽन्विते।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 306)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1591 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मरकत-मणि → मरकतमणि

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