श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.22

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

वापीषु विद्रुमतटास्वमलामृताप्सु

प्रेष्यान्विता निजवने तुलसीभिरीशम्।

अभ्यर्चती स्वलकमुन्‍नसमीक्ष्य वक्‍त्र-

मुच्छेषितं भगवतेत्यमताङ्ग यच्छ्रीः॥ २२

vāpīṣu vidrumataṭāsvamalāmṛtāpsu

preṣyānvitā nijavane tulasībhirīśam|

abhyarcatī svalakamunnasamīkṣya vaktra-

muccheṣitaṃ bhagavatetyamatāṅga yacchrīḥ|| 22

अर्थ

प्यारे देवताओ! जिस समय दासियोंको साथ लिये वे अपने क्रीडावनमें तुलसीदलद्वारा भगवान्‌का पूजन करती हैं, तब वहाँके निर्मल जलसे भरे हुए सरोवरोंमें, जिनमें मूँगेके घाट बने हुए हैं, अपना सुन्दर अलकावली और उन्‍नत नासिकासे सुशोभित मुखारविन्द देखकर ‘यह भगवान्‌का चुम्बन किया हुआ है’ यों जानकर उसे बड़ा सौभाग्यशाली समझती हैं॥ २२॥✎ 261 262 1307 1308

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #261 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #262 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1307 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वैकुण्ठ-लोकमें → वैकुण्ठलोकमें
  • #1308 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: प्रति-बिम्ब → प्रतिबिम्ब

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