॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.15.22
वापीषु विद्रुमतटास्वमलामृताप्सु
प्रेष्यान्विता निजवने तुलसीभिरीशम्।
अभ्यर्चती स्वलकमुन्नसमीक्ष्य वक्त्र-
मुच्छेषितं भगवतेत्यमताङ्ग यच्छ्रीः॥ २२
vāpīṣu vidrumataṭāsvamalāmṛtāpsu
preṣyānvitā nijavane tulasībhirīśam|
abhyarcatī svalakamunnasamīkṣya vaktra-
muccheṣitaṃ bhagavatetyamatāṅga yacchrīḥ|| 22
अर्थ
प्यारे देवताओ! जिस समय दासियोंको साथ लिये वे अपने क्रीडावनमें तुलसीदलद्वारा भगवान्का पूजन करती हैं, तब वहाँके निर्मल जलसे भरे हुए सरोवरोंमें, जिनमें मूँगेके घाट बने हुए हैं, अपना सुन्दर अलकावली और उन्नत नासिकासे सुशोभित मुखारविन्द देखकर ‘यह भगवान्का चुम्बन किया हुआ है’ यों जानकर उसे बड़ा सौभाग्यशाली समझती हैं॥ २२॥✎ 261 262 1307 1308