श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.31

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

ताभ्यां मिषत्स्वनिमिषेषु निषिध्यमानाः

स्वर्हत्तमा ह्यपि हरेः प्रतिहारपाभ्याम्।

ऊचुः सुहृत्तमदिदृक्षितभङ्ग ईष-

त्कामानुजेन सहसा त उपप्लुताक्षाः॥ ३१

tābhyāṃ miṣatsvanimiṣeṣu niṣidhyamānāḥ

svarhattamā hyapi hareḥ pratihārapābhyām|

ūcuḥ suhṛttamadidṛkṣitabhaṅga īṣa-

tkāmānujena sahasā ta upaplutākṣāḥ|| 31

अर्थ

जब उन द्वारपालोंने वैकुण्ठवासी देवताओंके सामने पूजाके सर्वश्रेष्ठ पात्र उन कुमारोंको इस प्रकार रोका, तब अपने प्रियतम प्रभुके दर्शनोंमें विघ्न पड़नेके कारण उनके नेत्र सहसा कुछ-कुछ क्रोधसे लाल हो उठे और वे इस प्रकार कहने लगे॥ ३१॥✎ 1592

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1592 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: बालकों-से → बालकोंसे

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