श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.34

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

तद्वाममुष्य परमस्य विकुण्ठभर्तुः

कर्तुं प्रकृष्टमिह धीमहि मन्दधीभ्याम्।

लोकानितो व्रजतमन्तरभावदृष्ट्या

पापीयसस्त्रय इमे रिपवोऽस्य यत्र॥ ३४

tadvāmamuṣya paramasya vikuṇṭhabhartuḥ

kartuṃ prakṛṣṭamiha dhīmahi mandadhībhyām|

lokānito vrajatamantarabhāvadṛṣṭyā

pāpīyasastraya ime ripavo'sya yatra|| 34

अर्थ

तुम हो तो इन भगवान् वैकुण्ठनाथके पार्षद, किन्तु तुम्हारी बुद्धि बहुत मन्द है। अतएव तुम्हारा कल्याण करनेके लिये हम तुम्हारे अपराधके योग्य दण्डका विचार करते हैं। तुम अपनी मन्द भेदबुद्धिके दोषसे इस वैकुण्ठलोकसे निकलकर उन पापमय योनियोंमें जाओ, जहाँ काम, क्रोध, लोभ—प्राणियोंके ये तीन शत्रु निवास करते हैं॥ ३४॥✎ 264

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #264 शब्दोंके बीचका स्थान: पार्षद,किन्तु → पार्षद, किन्तु

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