श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.15.38

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

तं त्वागतं प्रतिहृतौपयिकं स्वपुम्भि-

स्तेऽचक्षताक्षविषयं स्वसमाधिभाग्यम्।

हंसश्रियोर्व्यजनयोः शिववायुलोल-

च्छुभ्रातपत्रशशिकेसरशीकराम्बुम्॥ ३८

taṃ tvāgataṃ pratihṛtaupayikaṃ svapumbhi-

ste'cakṣatākṣaviṣayaṃ svasamādhibhāgyam|

haṃsaśriyorvyajanayoḥ śivavāyulola-

cchubhrātapatraśaśikesaraśīkarāmbum|| 38

अर्थ

सनकादिने देखा कि उनकी समाधिके विषय श्रीवैकुण्ठनाथ स्वयं उनके नेत्रगोचर होकर पधारे हैं, उनके साथ-साथ पार्षदगण छत्र-चामरादि लिये चल रहे हैं तथा प्रभुके दोनों ओर राजहंसके पंखोंके समान दो श्वेत चँवर डुलाये जा रहे हैं। उनकी शीतल वायुसे उनके श्वेत छत्रमें लगी हुई मोतियोंकी झालर हिलती हुई ऐसी शोभा दे रही है मानो चन्द्रमाकी किरणोंसे अमृतकी बूँदें झर रही हों॥ ३८॥

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