श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.16.1

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

अथ षोडशोऽध्यायः

जय-विजयका वैकुण्ठसे पतन

ब्रह्मोवाच

इति तद् गृणतां तेषां मुनीनां योगधर्मिणाम्।

प्रतिनन्द्य जगादेदं विकुण्ठनिलयो विभुः॥ १

iti tad gṛṇatāṃ teṣāṃ munīnāṃ yogadharmiṇām|

pratinandya jagādedaṃ vikuṇṭhanilayo vibhuḥ|| 1

अर्थ

श्रीब्रह्माजीने कहा—देवगण! जब योगनिष्ठ सनकादि मुनियोंने इस प्रकार स्तुति की, तब वैकुण्ठ-निवास श्रीहरिने उनकी प्रशंसा करते हुए यह कहा॥ १॥ ✎ 1593

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1593 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: योग-निष्ठ → योगनिष्ठ

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