श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.16.6

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

यस्यामृतामलयशःश्रवणावगाहः

सद्यः पुनाति जगदाश्‍वपचाद्विकुण्ठः।

सोऽहं भवद्भ्य उपलब्धसुतीर्थकीर्ति-

श्छिन्द्यां स्वबाहुमपि वः प्रतिकूलवृत्तिम्॥ ६

yasyāmṛtāmalayaśaḥśravaṇāvagāhaḥ

sadyaḥ punāti jagadāśvapacādvikuṇṭhaḥ|

so'haṃ bhavadbhya upalabdhasutīrthakīrti-

śchindyāṃ svabāhumapi vaḥ pratikūlavṛttim|| 6

अर्थ

मेरी निर्मल सुयश-सुधामें गोता लगानेसे चाण्डालपर्यन्त सारा जगत् तुरंत पवित्र हो जाता है, इसीलिये मैं ‘विकुण्ठ’ कहलाता हूँ। किन्तु यह पवित्र कीर्ति मुझे आपलोगोंसे ही प्राप्त हुई है। इसलिये जो कोई आपके विरुद्ध आचरण करेगा, वह मेरी भुजा ही क्यों न हो—मैं उसे तुरन्त काट डालूँगा॥ ६॥✎ 1309

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1309 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): प्रसन्‍न-चित्तसे → प्रसन्‍नचित्तसे

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