श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.17.22

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

मनोवीर्यवरोत्सिक्तमसृण्यमकुतोभयम् ।

भीता निलिल्यिरे देवास्तार्क्ष्यत्रस्ता इवाहयः॥ २२

manovīryavarotsiktamasṛṇyamakutobhayam |

bhītā nililyire devāstārkṣyatrastā ivāhayaḥ|| 22

अर्थ

उसके मनोबल, शारीरिक बल तथा ब्रह्माजीके वरने उसे मतवाला कर रखा था; इसलिये वह सर्वथा निरंकुश और निर्भय हो रहा था। उसे देखकर देवतालोग डरके मारे वैसे ही जहाँ-तहाँ छिप गये, जैसे गरुड़के डरसे साँप छिप जाते हैं॥ २२॥

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