श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.17.5

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

ववौ वायुः सुदुःस्पर्शः फूत्कारानीरयन्मुहुः।

उन्मूलयन्‍नगपतीन्वात्यानीको रजोध्वजः॥ ५

vavau vāyuḥ suduḥsparśaḥ phūtkārānīrayanmuhuḥ|

unmūlayannagapatīnvātyānīko rajodhvajaḥ|| 5

अर्थ

बार-बार सायँ-सायँ करती और बड़े-बड़े वृक्षोंको उखाड़ती हुई बड़ी विकट और असह्य वायु चलने लगी। उस समय आँधी उसकी सेना और उड़ती हुई धूल ध्वजाके समान जान पड़ती थी॥ ५॥

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