सूर्य और चन्द्रमा बार-बार ग्रसे जाने लगे तथा उनके चारों ओर अमंगलसूचक मण्डल बैठने लगे। बिना बादलोंके ही गरजनेका शब्द होने लगा तथा गुफाओंमेंसे रथकी घरघराहटका-सा शब्द निकलने लगा॥ ८॥
मुहुः परिधयोऽभूवन् सराह्वोः शशिसूर्ययोः।
निर्घाता रथनिर्ह्रादा विवरेभ्यः प्रजज्ञिरे॥ ८
सूर्य और चन्द्रमा बार-बार ग्रसे जाने लगे तथा उनके चारों ओर अमंगलसूचक मण्डल बैठने लगे। बिना बादलोंके ही गरजनेका शब्द होने लगा तथा गुफाओंमेंसे रथकी घरघराहटका-सा शब्द निकलने लगा॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.17.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 318) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/17/8/