श्रीभगवान्ने कहा—अरे! सचमुच ही हम जंगली जीव हैं, जो तुझ-जैसे ग्रामसिंहों (कुत्तों)-को ढूँढ़ते फिरते हैं। दुष्ट! वीर पुरुष तुझ-जैसे मृत्युपाशमें बँधे हुए अभागे जीवोंकी आत्मश्लाघापर ध्यान नहीं देते॥ १०॥✎ 275
सत्यं वयं भो वनगोचरा मृगा
युष्मद्विधान्मृगये ग्रामसिंहान्।
न मृत्युपाशैः प्रतिमुक्तस्य वीरा
विकत्थनं तव गृह्णन्त्यभद्र॥ १०
श्रीभगवान्ने कहा—अरे! सचमुच ही हम जंगली जीव हैं, जो तुझ-जैसे ग्रामसिंहों (कुत्तों)-को ढूँढ़ते फिरते हैं। दुष्ट! वीर पुरुष तुझ-जैसे मृत्युपाशमें बँधे हुए अभागे जीवोंकी आत्मश्लाघापर ध्यान नहीं देते॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.18.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 322) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/18/10/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#275 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने