श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.18.13

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

मैत्रेय उवाच

सोऽधिक्षिप्तो भगवता प्रलब्धश्‍च रुषा भृशम्।

आजहारोल्बणं क्रोधं क्रीड्यमानोऽहिराडिव॥ १३

so'dhikṣipto bhagavatā pralabdhaśca ruṣā bhṛśam|

ājahārolbaṇaṃ krodhaṃ krīḍyamāno'hirāḍiva|| 13

अर्थ

मैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! जब भगवान्‌ने रोषसे उस दैत्यका इस प्रकार खूब उपहास और तिरस्कार किया, तब वह पकड़कर खेलाये जाते हुए सर्पके समान क्रोधसे तिलमिला उठा॥ १३॥ वह खीझकर लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगा, उसकी इन्द्रियाँ क्रोधसे क्षुब्ध हो उठीं और उस दुष्ट दैत्यने बड़े वेगसे लपककर भगवान्‌पर गदाका प्रहार किया॥ १४॥ ✎ 276 277 278

यह व्याख्या श्लोक 3.18.13 से 3.18.14 तककी एक साथ है।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #276 शब्दोंके बीचका स्थान: गदाकाप्रहार → गदाका प्रहार
  • #277 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् पर → भगवान्‌पर
  • #278 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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