श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.19.15

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

वृणे स्वशूले बहुधारिणा हरेः

प्रत्येत्य विस्तीर्णमुरो विभूतिमत्।

प्रवृद्धरोषः स कठोरमुष्टिना

नदन् प्रहृत्यान्तरधीयतासुरः॥ १५

vṛṇe svaśūle bahudhāriṇā hareḥ

pratyetya vistīrṇamuro vibhūtimat|

pravṛddharoṣaḥ sa kaṭhoramuṣṭinā

nadan prahṛtyāntaradhīyatāsuraḥ|| 15

अर्थ

भगवान्‌के चक्रसे अपने त्रिशूलके बहुत-से टुकड़े हुए देखकर उसे बड़ा क्रोध हुआ। उसने पास आकर उनके विशाल वक्षःस्थलपर, जिसपर श्रीवत्सका चिह्न सुशोभित है, कसकर घूँसा मारा और फिर बड़े जोरसे गरजकर अन्तर्धान हो गया॥ १५॥✎ 285

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #285 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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