विदुरजी! ऐसे-ऐसे पहाड़ दिखायी देने लगे, जो तरह-तरहके अस्त्र-शस्त्र बरसा रहे थे। हाथमें त्रिशूल लिये बाल खोले नंगी राक्षसियाँ दीखने लगीं॥ २०॥✎ 286287
गिरयः प्रत्यदृश्यन्त नानायुधमुचोऽनघ।
दिग्वाससो यातुधान्यः शूलिन्यो मुक्तमूर्धजाः॥ २०
विदुरजी! ऐसे-ऐसे पहाड़ दिखायी देने लगे, जो तरह-तरहके अस्त्र-शस्त्र बरसा रहे थे। हाथमें त्रिशूल लिये बाल खोले नंगी राक्षसियाँ दीखने लगीं॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.19.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 326) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/19/20/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)