॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.19.26
स आहतो विश्वजिता ह्यवज्ञया
परिभ्रमद्गात्र उदस्तलोचनः।
विशीर्णबाह्वङ्घ्रिशिरोरुहोऽपतद्
यथा नगेन्द्रो लुलितो नभस्वता॥ २६
sa āhato viśvajitā hyavajñayā
paribhramadgātra udastalocanaḥ|
viśīrṇabāhvaṅghriśiroruho'patad
yathā nagendro lulito nabhasvatā|| 26
अर्थ
विश्वविजयी भगवान्ने यद्यपि बड़ी उपेक्षासे तमाचा मारा था, तो भी उसकी चोटसे हिरण्याक्षका शरीर घूमने लगा, उसके नेत्र बाहर निकल आये तथा हाथ-पैर और बाल छिन्न-भिन्न हो गये और वह निष्प्राण होकर आँधीसे उखड़े हुए विशाल वृक्षके समान पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ २६॥✎ 288