mānayan sa mṛdhe dharmaṃ viṣvaksenaṃ prakopayan|| 4
अर्थ
उस समय शत्रुपर वार करनेका अच्छा अवसर पाकर भी हिरण्याक्षने उन्हें निरस्त्र देखकर युद्धधर्मका पालन करते हुए उनपर आक्रमण नहीं किया। उसने भगवान्का क्रोध बढ़ानेके लिये ही ऐसा किया था॥ ४॥✎ 281
स तदा लब्धतीर्थोऽपि न बबाधे निरायुधम्।
मानयन् स मृधे धर्मं विष्वक्सेनं प्रकोपयन्॥ ४
उस समय शत्रुपर वार करनेका अच्छा अवसर पाकर भी हिरण्याक्षने उन्हें निरस्त्र देखकर युद्धधर्मका पालन करते हुए उनपर आक्रमण नहीं किया। उसने भगवान्का क्रोध बढ़ानेके लिये ही ऐसा किया था॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.19.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 324) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/3/19/4/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)