श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.2.23

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

अहो बकी यं स्तनकालकूटं

जिघांसयापाययदप्यसाध्वी ।

लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यं

कं वा दयालुं शरणं व्रजेम॥ २३

aho bakī yaṃ stanakālakūṭaṃ

jighāṃsayāpāyayadapyasādhvī |

lebhe gatiṃ dhātryucitāṃ tato'nyaṃ

kaṃ vā dayāluṃ śaraṇaṃ vrajema|| 23

अर्थ

पापिनी पूतनाने अपने स्तनोंमें हलाहल विष लगाकर श्रीकृष्णको मार डालनेकी नियतसे उन्हें दूध पिलाया था; उसको भी भगवान्‌ने वह परम गति दी, जो धायको मिलनी चाहिये। उन भगवान् श्रीकृष्णके अतिरिक्त और कौन दयालु है, जिसकी शरण ग्रहण करें॥ २३॥✎ 195

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #195 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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